12/31/2008

झरोखा



।। झरोखा ।।



बन्द दरवाजे के भीतर


होती है एक छोटी दुनिया


आराम के लिए खास जगह


रखा जाता सोफा,


पहली नजर में पसन्द


आती है टीवी रखने की जगह,


वास्तु से तय करते हैं


हर चीज का मुकाम ।


करीने से सजी इस


दुनिया में बहुत जरूरी है


पढ़ने को किताबें


लिखने को मेज


आराम को नाजुक सेज


एक कोना


जहाँ हो प्यार की बातें


जहाँ पूछ सकें


एक दूसरे की तकलीफें


खाने की मेज पर साथ होने


और सुबह सैर पर जाने का


नियम जितना जरूरी है


उससे कहीं ज्यादा जरूरी है


एक झरोखे का होना ।


इसी से होकर आएँगी


नन्हीं किरणें सूरज की


पुरवाई की राह होगी यह खिड़की


छोटी दुनिया को बड़ी दुनिया


से जोड़ने के लिए


शहर के फ्लेट में


चाहिए एक खिड़की


इसी झरोखे से


फुदकती आई चिड़िया


बसाएगी अपनी


छोटी दुनिया ।


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‘सपनों के आसपास’ शीर्षक काव्य संग्रह से पंकज शुक्ला ‘परिमल’ की एक कविता


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12/30/2008

खबर



।। खबर ।।



जब तक खबर लिखता हूँ


जल जाती है बेस्ट बेकरी


उजड़ जाता है सिंगूर,


नन्दीग्राम में खाली हो जाते हैं कारतूस ।


दुर्घटनाओं में उजड़ जाते हैं घर


आतंकी छीन लेते हैं जीवन का रंग ।


आप तक पहुँचता है अखबार


तब तक घण्टों पुरानी हो जाती है पीड़ा,


जब तक जुड़ते हैं सम्वेदनाओं के तार


बिना मरहम सूख जाते हैं घाव ।
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12/29/2008

बसन्‍त


।। बसन्त ।।

रोज देखता हूँ तुम्हारी ओर
लगता है हर दिन
बारह घण्टे पुरानी हो रही हो तुम ।
राशन, सब्जी, दूध, बिजली,
के बढ़ते दाम व्यस्त रखते हैं तुम्हें
हिसाब-किताब में ।
नई चिन्ता के साथ
केलेण्डर में ही आता है
फागुन, सावन, कार्तिक ।
जिन्दगी का गुणा-भाग
करते-करते
जब ढल आती है
कोई लट चेहरे पर
या पोंछते हुए पसीना माथे का
मुस्कुरा देती हो मुझे देख
सच समझो उतर आता है बसन्त
हम दोनों की जिन्दगी में ।

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12/28/2008

यादों का सन्‍दर्भ


।। यादों का सन्दर्भ ।।

घर बदलने से पहले
बच्चों को हिदायत देते हुए
खुद को भी बाँधना चाहा था ।
शहर में अपनी हैसियत का
घर जुटा भी लें तो
वहाँ इतनी जगह नहीं होती कि
बीवी-बच्चों के साथ
समा सके पुराने घर का सारा सामान
न चाहते हुए भी अलग करना होता है
काम आने की उम्मीद से
बचा कर रखा गया
कोई स्क्रू, कम पंक्चर हुआ ट्यूब
खाली डब्बा और अखबार ।
नए घर को खोजने से
ज्यादा तकलीफदेह है
यादों का सन्दर्भ बन गए
सामान को छोड़ना ।
घण्टों सोच के बाद भी
छोड़ना ही पड़ता है
छोटू का खिलौना,
पुरानी सन्दूक,
उसमें तह कर रखा गया कोट ।
छोड़ दिए गए सामानों में
चिट्ठियों का बण्डल भी होता है,
जिसमें से झाँकते हैं
पुराने दिन ।
नए घर में आई पहली चिट्ठी
एक दिन ऐसे ही पुरानी होगी ।
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12/27/2008

हसरत



।। हसरत ।।



मैं अपनी लाड़ली को


देना चाहता हूँ


सपनों का आकाश,


सितारों भरी रात,


लहलहाती धरती,


हरहराती नदियाँ,


चहचहाते पक्षी,


मुस्काते फूल,


और ढेर सारा प्यार


इतना कि वह सब


समेटती रहे


और थक कर सो जाए


ख्वाब चुनते हुए ।


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12/26/2008

भरोसा



।। भरोसा ।।



जब से यह दुनिया बनी है


तब से ही


दो कौमों में बँट गई है ।


एक, जो यकीन करते हैं,


जिन्हें नहीं सुहाता


सपनों का बिखरना


और इन्सान का बदलना ।


विश्‍वास टूटते हैं तो वे खुद टूट जाते हैं


फिर नहीं कर पाते भरोसा


न खुद पर न खुदा पर ।


दूसरे, जो बिखरे सपनों


को जोड़ते हैं बार-बार ।


विश्‍वास टूट रहे हैं,


इसलिए नहीं हारते वे ।


वे बुनते हैं नई राह


यह मानते हुए कि


एक उम्मीद का बुझना


दूसरे सपने का जागना है ।


जब से यह दुनिया बनी है


शायद तब ही से


दो कौमों में बँट गई है ।


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12/25/2008

साहस


।। साहस ।।

समस्याएँ अच्छी लगती हैं मुझे ।
मुश्किलें रूबरू करवाती हैं मुझे
मेरे साहस, मेरे धैर्य से ।
वे आकर बढ़ा जाती हैं भरोसा
कि समस्याओं से भागा नहीं,
लड़ा जाता है ।
मैं लड़ता हूँ, जीतने के लिए ।
क्या हुआ जो कभी भारी
पड़ी कोई समस्या
मैं मापता हूँ
गहराई विश्‍वास की
अपना पथ-अपना धैर्य ।
अच्छा लगता है मुझे
जूझना समस्याओं से ।
इनसे जीत कर मिलता है, साहस
और हार कर भी ।

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12/24/2008

प्‍यार


।। प्यार ।।


क्यूँ नहीं समझ पाते हम

बात इतनी सी

हर क्रिया के विपरीत होती है,

प्रतिक्रिया ।

पतझड़ में पत्तों का

शाख को छोड़ना

एक क्रिया है

इसकी प्रतिक्रिया में

पेड़ होगा फिर सदाबहार ।

पत्तों का निकलना

सूख कर गिरना

फिर, कोंपलों का फूटना

महज संयोग नहीं

सहज सन्देश है,

प्यार साथ-साथ मरना नहीं

जीने का नाम है ।

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12/23/2008

रचना



।। रचना ।।



हर युग में होते हैं


कुछ ऐसे लोग


जो देते हैं आवाज शब्दों को ।


वे जो डूबती नब्ज में


नई जान फूँकते शब्दों को


गढ़ते और अर्थ देते


अपने लहू से ।


उनका जीना इसलिए नहीं कि


केवल जीना है उन्हें,


वरन् वे अपने समय को


जीवन देते हैं ।


शायद, हम भी हैं उन्हीं में से एक ।


अभिमन्यु की तरह,


हमें भी करनी है कोशिश तोड़ने की


चक्रव्यूह अपना-अपना ।


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12/22/2008

यादें


।। यादें ।।

नए शहर के अनजान माहौल में

हमें याद नहीं करना पड़ता,

बरबस ताजा हो उठता है

अपना गाँव, कोई मित्र ।

खाना खाते-खाते

माँ याद हो आती है

जैसे गाड़ी बिगड़ने पर

याद आ जाता है पुराना मिस्त्री ।

उदास होने पर

साहस दे जाती हैं वे बातें,

जो कही थीं सबने, बरसों पहले

घर से निकलते वक्त ।

जीवन में जब भी

मिलती है खुशी

पुराने साथी ही याद आते हैं

पहले-पहल ।

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12/21/2008

यादें


।। यादें ।।


नए शहर के अनजान माहौल में

हमें याद नहीं करना पड़ता,

बरबस ताजा हो उठता है

अपना गाँव, कोई मित्र ।

खाना खाते-खाते

माँ याद हो आती है

जैसे गाड़ी बिगड़ने पर

याद आ जाता है पुराना मिस्त्री ।

उदास होने पर

साहस दे जाती हैं वे बातें,

जो कही थीं सबने, बरसों पहले

घर से निकलते वक्त ।

जीवन में जब भी

मिलती है खुशी

पुराने साथी ही याद आते हैं

पहले-पहल ।

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12/20/2008

मजदूरी



।। मजदूरी ।।



किसी की ऐशगाह का आकार


उनके सपनों, सुखों


और पेट के


फैलने सिकुड़ने का पैमाना है ।


अट्टालिका की ऊँचाई


और सीमेण्ट का वजन


ही तय करेगा


कि उनके चौके से


कितने दिन उठेगा धुआँ ।


पसन्द न आने पर


ढहा दिया जाएगा


कड़ी मेहनत से बनाया ढाँचा


फिर शुरु होगी नए निर्माण की कवायद ।


आपकी नजरों में भले ही यह रईसी है


पर उन्हें मिलता है काम


इसलिए जरूरी है,


सेठ का यूँ सिरफिरा होना ।


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12/19/2008

जीवन



।। जीवन ।।



शहर जब बन्द होता है


कई चीजें होती हैं बन्द ।


दुकानों पर लटके होते हैं


तालेगाड़ियाँ बन्द होती हैं,


नहीं भागते ताँगे,


उस दिन इत्मीनान से चने


खाते हैं घोड़े


और टाँगें फैलाए सोता है रामदीन ।


ठीक इसी वक्त


जब शहर में बन्द होता है


सड़क पर खेला जाता है क्रिकेट


दुकानों के बाहर


जमती हैं शतरंज की बाजियाँ


खूब फेंटे जाते हैं ताश ।


इसी वक्त सुने जाते हैं


पुराने गाने


होती है फरमाइश पसन्ददीदा खाने की ।


दिन में पापा को घर देख


कुलाँचे भरते हैं बच्चे ।


इस तरह पूरी होती है


दिल में तह कर रखी तमन्नाएँ ।


ठीक उस वक्त जब


शहर बन्द होता है


जीवन चलता है


अपने खास अन्दाज में ।


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12/18/2008

घाव



।। घाव ।।


किसने कहा कि

विस्‍फो‍ट के लिए

चाहिए बारूद,

घर जलाने के लिए

चाहिए तीलियां ।

घर हो या सपने

पल में ध्‍वस्‍त होते हैं ।

क्षण में छिनता है आशियाना

बिना पेट्रोल धधकता है शहर ।

कविता जो मरहम है

आपके मुंह से निकलने

पर वही शब्‍द दे जाते हैं घाव ।

नेताजी, आग से उगलते

शब्‍‍दों से लाख दर्जा अच्‍‍छे

हैं आपके झूठे आश्वासन ।


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12/16/2008

पहचान



।। पहचान ।।



हम सिमटते जा रहे हैं


अपने घर, परिवार और


खुद के दायरे में ।


अनगिनत मुश्किलों के बीच


एक दिक्कत यह भी


नहीं बता सकते किसी को


अपना पता ।


नुक्कड़ के पान वाले या


परचुन की दुकान का हवाला


देते हुए कहते हैं,


‘‘पूछ लेना मुन्ने का घर’’ ।


रास्तों व नम्बरों की उलझन


से बचने के लिए


हम लेते हैं बच्चों का नाम ।


तमाम रिश्‍तों के साथ


गुम होती पहचान को


बचाने में बच्चे ही काम आते हैं ।


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12/15/2008

खूबसूरती



।। खूबसूरती ।।



लकदक रोशनी और


कैमरों के फ्लेश के


बीच ही नहीं होता सौन्दर्य ।


इंच में बँधी देह,


तयशुदा मुस्कुराहट


और रटे-रटाए जवाबों में


खूबसूरती कम


पैकेजिंग ज्यादा होती है ।


पत्थर तोड़ते इरादों


और रोटी बेलते हाथों


में भी होता है सौन्दर्य ।


विजय पर इठलाती रूपसी


से ज्यादा खूबसूरत है


आँगन बुहारती स्त्री,


जिसके रहते मैला


नहीं होता घर और परिवार ।


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12/14/2008

आस्‍था



।। आस्था ।।



आस्थाएँ गढ़ती हैं ईश्‍वर ।


हमें विश्‍वास है


भलाई, ईमानदारी, सच्चाई पर ।


यही विश्‍वास बनाता है


किसी को देवतुल्य ।


जीवन भर जिन्हें पूजते हैं,


आचरण में उन्हीं से होते हैं दूर ।


कोई और नहीं,


हम ही तोड़ते हैं अपना विश्‍वास ।


भ्रष्‍ट करते हैं धर्म ।


पूजने की जगह


जीने लगें आस्थाएँ,


तो होंगे उस ईश्‍वर के करीब


जिसे पाने को उम्रभर


करते रहे जप, तप, उपवास ।
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12/13/2008

डाक्‍टर



।। डाक्टर ।।



हमारे पास ढेर सारे किस्से हैं,


अपनी आपबीती सुनाने को ।


बार-बार याद आ जाते हैं


वे दिन जब तुम्हारे ही एक अपने ने


हर ली थी पीड़ा ।


बताते नहीं थकते हैं,


कैसे बचाली गई थी जान,


वरना सभी उम्मीद छोड़ चुके थे ।


दुआओं और दवाओं से


ज्यादा भरोसा था तुम पर ।


मुझे शर्म आती है


तुम्हारी करतूत बताते हुए


जीवन देने के लिए छुरी उठाते


तो वरदान होता,


लेकिन तुमने हथियार की


तरह उठाई छुरी


एक नहीं सैंकड़ों लोग


पड़े थे आपरेशन टेबल पर निरीह


उनके मासूम चेहरों को देख


कर भी दया नहीं आई तुम्हें


सोच ही नहीं पाए


हरे नोटों के आगे


उजाड़ होती दुनिया के बारे में


अफसोस, हमारे पास तुम


जैसे डाक्टरों की भी हकीकत है,


ऐसी असलियत जिसे


हम किस्सों में भी नहीं चाहते ।
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12/12/2008

स्त्री



।। स्त्री ।।


सयानी होते ही


तू समझ गई थी


अपनी हदें और जिम्मेदारियाँ ।


किस वक्त चुप रहना है


और कब जागना है


खुद ही सीख लिया था तुमने ।


पिता की जेब देख


जाहिर ही नहीं की


अपनी इच्छाएँ


बाहर निकलने पर भाई


का पहरा तुझे अखरा ही नहीं


कई बार छोटे ने सिखाया


तुझे अदब का तरीका


पर तू खामोश रही


भय्या राजा की बेअदबी पर ।


तेरे हिस्से आई कभी कोई खास चीज


तो तुझसे पहले झपट लिया उसने


जिस पर तू हर सुख न्यौछावर करती रही ।


जिस पति के लिए तू


बिछती रही हरदम


उसने तो कभी जरूरी नहीं समझा


कि पूजा के अलावा


बैठाए कभी अपने पास ।


जिसे तुमने अपने संस्कारों से सिरजा था


उस बेटे के ताने तू


भुला देती है मुस्कुराते हुए ।


खीर हो या लजीज सब्जी


हर सुख पाने में अन्तिम रही तुम ।


कौन जाने अपना दुख छुपाने में


क्या आनन्द मिलता है तुम्हें


जब-जब देखता हूँ तुझे


समझ ही नहीं पाता


तुमने अपने सपनों को क्यों नहीं बुना


वैसा जैसा बनाया था मेरा स्वेटर ।


तुमने क्यों नहीं रचा


अपना सुख


गोल-गोल चपाती की तरह ।


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12/11/2008

मौजूदगी






।। मौजूदगी ।।




न जाने कैसी हवा, पानी और



खादकी तलाश में



शहर आ गया हूँ,



जबकि रोज गुण गाता हूँ गाँव के ।



तो हम यहाँ क्यों हैं ?



अक्सर पूछती है पत्नी



और मैं गिनाता हूँ बहाने



छुपाते हुए शहर के नुक्स सारे ।



तो अपनी बेचैनी में प्रश्‍न किया करती है



कि कौन सा कोना सन्तुष्‍ट हुआ,



यहाँ आने से



जैसे आज विभोर पूछ रहा था



अपने पापा से -



‘‘खण्डवा कितना अच्छा है न, पापा ।



हम वहाँ क्यों नहीं रहते ?’’



जानता हूँ, बेटे को समझाने के लिए



एक पिता छुपा गया होगा



शहर के ऐब सारे ।



अक्सर ही जुटाना होते हैं



हम जैसे लोगों को शहर आने के बहाने ।



अक्सर बावस्ता होता है प्रश्‍न



हम शहर में क्यों हैं ?



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12/10/2008

सम्‍बन्‍ध


।। सम्बन्ध ।।



नया-नया था शहर में


दोस्तों में बैठता तो


आश्‍‍चर्य होता


उनकी टेलीफोन डायरी


पूरी भरी होती


किसी के पास तो


दो-दो डायरियाँ थीं ।


मेरा क्या था गाँव में


दो-चार दोस्त ।


अब जब शहर आ गया हूँ तो


मेरे पास भी टेलीफोन डायरी है


गाँव के दोस्त


अभी भी याद हैं


और उनके टेलीफोन नम्बर भी ।


डायरी में उनके टेलीफोन नम्बर नहीं हैं


यहाँ तो सिर्फ बाजार है


और बाजार में बिकते लोग ।


जैसी आपकी ‘पाकेट’ होगी


उसी वजन का ‘दोस्त’ तैयार ।


आज एक और दोस्त खरीदा मैंने,


अपनी डायरी में


अभी-अभी


एक टेलीफोन नम्बर लिखा है ।

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‘सपनों के आसपास’ शीर्षक काव्य संग्रह से पंकज शुक्ला ‘परिमल’ की एक कविता


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12/09/2008

हकीकत






।। हकीकत ।।




वे सख्त होते हैं



थोड़े बदमिजाज भी



छोटे-छोटे प्यारे बच्चों



से बेरहमी से पेश आते हैं ।



स्कूल बस या आटो रिक्‍शा



चालकों के बारे में



यही धारणा थी मेरी ।



पर, उस दिन



जावरा फाटक की बन्द



रेल्वे क्रासिंग पर क्या देखता हूँ-



एक स्कूली रिक्‍शा का चालक



बच्चों की फरमाइश पूरी कर रहा है ।



पास बैठी महिला से



जाम या बेर खरीद कर



बच्चों को खिला रहा है ।



कई बार अपनी मान्यताओं



और सुनी गई बातों के विपरीत



हकीकत यूँ आ धमकती है



और हमें करना ही



होता है यकीन ।




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12/08/2008

।। अवसर ।।







।। अवसर ।।





कभी हम परखते उसे



अपनी कसौटी पर ।



कभी लगती मरुभूमि



और हम भटकते मुसाफिर से



कभी ठण्डे झोंके की तरह



और हम महसूसते उसका अस्तित्व



पकड़ने की चाहत में



हाथ से फिसलती जिन्दगी



और हम ठगे से तकते उसे



करीब से गुजरते हुए ।



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12/07/2008

सवाल - 3



।। सवाल-3 ।।



मौन

सिले रहता है होठों को

और करता है इन्तजार

स्फुटित हों शब्द ऐसे

जो हों खामोशी से बेहतर ।


विचार

उमड़ते-घुमड़ते बादल

उठते और छा जाते

लगता अब नहीं होगा

सूर्योदय फिर कभी


हृदय
कभी उड़ता ऊँची उड़ान

कभी थक से बैठ जाता

कि अब निकली जान


कौन है जो तोड़े मौन,
छाँट दे विचारों की धुन्ध

और हर ले हृदय की पीड़ा ?
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12/06/2008

सवाल - 2


।। सवाल-2 ।।


हैं कुछ ऐसे लोग जिन्हें मिलता है सुकून

आहत कर सम्वेदनाओं को ।

जो करते हैं लहूलुहान

कोमली भावनाओं को

हाँ, हैं कुछ ऐसे भी जो होते हैं आह्लादित

औरों को कर हताहत ।

क्या तुम भी उन्हीं में से

या अलग ?

क्या तुम बोलोगे तब

जब बढ़ रहे होंगे उनके हाथ

तुम्हारी ओर

या तब भी रहोगे

निष्क्रिय-निरापद

जैसे अभी हो

जब लगी है तुम्हारे

पड़ोस में आग ।

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12/05/2008

सवाल-1



।। सवाल-1 ।।



तुम चलना चाहते हो समय के साथ ?


तोड़ना होगा ईमान का घेरा


मारना होगा जमीर


करना होगा कत्ल विश्‍वास


धर कर रूप नया, बदल कर चेहरा


सारे सिद्धान्त भूल कर ही


तुम चल सकते हो समय के साथ


क्या तुम कर पाओगे ऐसा ?


जरूरी हो गया है


अब बेलिहाज होना


वरना लोगों के साथ होकर भी


अकेले रह जाओगे


तरक्की की अन्धी दौड़ में


पीछे छूट जाओगे ।
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12/04/2008

कौरव सभा






।। कौरव सभा ।।




स्वर सभी घुटे-घुटे



चेहरे सभी, बुझे-बुझे



मौन कुछ, स्वीकृति लिये



अज्ञात शक्ति से दबे हुए



कहीं कोई बाधा आज नहीं



विद्रोह क्यों प्रस्फुटित नहीं



सब आज फिर मौन क्यों



सब भीष्म, विदुर, द्रोण क्यों ?



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12/03/2008

वारदातें



।। वारदातें ।।



शहर जल रहा है


ठीक उस सिगरेट की तरह


जो फँसी दो उँगलियों के बीच


लाशें गिर रही हैं,


जैसे गुल खिर रहा है ।


धुएँ की तरह फैल रही हैं वारदातें ।


शहर जल रहा है


दो उँगलियों में फँसी


सिगरेट की तरह ।


क्या यह आग जलाएगी कभी


उँगलियों को


या समय के होंठ पर


छोड़ जाएगी


एक स्याह निशान


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12/02/2008

तरक्‍की



।। तरक्की ।।



वहाँ ज्यादा कुछ नहीं था


एक चाय की दुकान


बस का इन्तजार करते


लोगों के बैठने की जगह


और एक दुकान साइकिल की ।


गाँव के बाहर बस स्टैण्ड कही जाने वाली


जगह पर इतना ही हुआ करता था ।


कच्ची सड़क के एक ओर थी


गंगाराम चाय की दुकान


और इसके ठीक सामने


गरीब नवाज साइकिल सर्विस ।


रफीक उस्ताद की दुकान से ही


किराए पर लेकर लोगों ने


साइकिल की सवारी सीखी थी ।


शायद इसीलिए ठीक-ठाक


चल रही थी उनके जीवन की गाड़ी ।


रफीक उस्ताद इसे खुदा का फजल कहा करते थे ।


ग्राहक के मामले में गंगाराम


रफीक उस्ताद से गरीब ही था ।


अक्सर रफीक उस्ताद,


यूँ ही अपनी ओर से


लोगों को चाय पिलाया करते थे ।


गंगाराम भी खूब समझता था


तभी तो खैरियत पूछने पर


वह कहा करता था


‘‘उस्ताद का फजल है’’


धीरे-धीरे तरक्की हुई ।


गाँव आबाद हुआ


बसों की आवाजाही बढ़ी


अखबार आने लगा


रेडियो और टी. वी. आया


पर बस स्टैण्ड आज भी वहीं है ।


वहीं है गंगाराम चायवाला


और रफीक उस्ताद साइकिल वाले ।


गंगाराम की दुकान पर मिठाई भी मिलती है,


लेकिन रफीक मियाँ यहाँ नहीं आते


न गंगाराम कहता है


‘‘उस्तद का फजल है’’


दोनों दुकानों के बीच


अब पक्की सड़क बन गई है ।


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11/28/2008

दंगाई



।। दंगाई ।।



उनके खाते में नहीं है


कोई उपलब्धि


हमेशा तालियाँ पीटने वालों


में ही शुमार रहे


कभी नहीं रहे मुखिया ।


स्कूल क्रिकेट टीम में भी


सबसे आखिरी में होता था


उनका नाम ।


पिता के लिए वे नालायक ही रहे


माँ ने कभी समझा नहीं बड़ा ।


ऐसे लोगों के पास भी


कुछ किस्से हैं, सुनाने को ।


किस्से उस रात के ।


कैसे थम गई थीं उन्हें


देख लोगों की साँसें


कैसे ऊँची दुकान का काँच


एक ही पत्थर में


भरभरा कर गिर गया था ।


वे खुद सोचते होंगे


कहाँ से आ गई थी


उनमें इतनी ताकत


कैसे कर दिया था,


एक ही बार में


धड़ सर से अलग ।
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11/27/2008

उस एक दिन



।। उस एक दिन ।।



जैसा सुना था ठीक वैसा ही


पाया तुम्हें भोजताल ।


अतुल जलराशि


जहाँ तक देख पाता हूँ


तुम्हीं नजर आते हो


धीर-गम्भीर


अपने सृष्‍टा की तरह प्रजापालक ।


हर शाम तुममें उतरता है


थका-हारा दिनकर ।


सुबह के साथ वह फिर


निकलता है फेरी पर


हो कर तरोताजा ।


उस आग उगलते सूरज


से परेशान होकर ही अजय


आया था तुम्हारी गोद में


डुबकियाँ मारने, गोते लगाने


मगर तुमने नहीं लौटाया उसे ।


तुम्हारे आगे घण्टों बहती रहीं


दो जोड़ी आँखें,


बेबस निगाहें हर लहर पर टिकी रहीं


मगर शान्त बने रहे तुम


जैसे कुछ हुआ ही न हो ।


जीवन देने वाले भगवान से


लाश दिलवाने की प्रार्थनाएँ


की जाती रहीं


फिर भी नहीं पसीजे तुम ।


कैसे प्रजापालक हो ?


दिनकर को तो कभी नहीं रोकते


फिर उस घर के सूरज को


क्यों रोक लिया अपने भीतर ।


कहो तो ?


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(भोपाल के बड़े तालाब में डूबे किशोर अजय को याद करते हुए)


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11/26/2008

सागर



।। सागर ।।



किनारे पसरी रेत पर


जमा भीड़, तुम्हारी लहरों में


ही तो तिरोहित करती है


अपने तनाव, अपने दुःख


अपना अकेलापन ।


दो दीवाने तुम्हारी लहरों


पर जिन्दगी का गीत रचते हैं ।


रोज लगता है मेला,


तुम्हारे ही सहारे कटती है


किसी की साँझ, किसी की जिन्दगी ।


मित्र, हमारी तो रोज सुनते हो


कभी अपनी नहीं कहते ।


देख रहा हूँ आजकल


मर्यादा पसन्द नहीं आ रही है ।


अपने तटबन्ध तोड़ने में


मजा आने लगा है तुम्हें ।


चाँदनी को देख ज्यादा


अधीर हो उठते हो तुम ।


ये कैसी अकुलाहट है,


कहो तो क्या परेशानी है


या तुम्हें भी जमाने की हवा लग गई है ?
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11/25/2008

बाजार



।। बाजार ।।



आओ, आओ, बोली लगाओ


जितना लगाओगे, उतना पाओगे ।


कोई फरेब नहीं, झूठा दिलासा नहीं


खुला खेल फर्रूखाबादी है


पारदर्शिता की पूरी गारण्टी है ।


जितनी बड़ी होगी लालसा


उतना ही दूर जाओगे


कम खर्च में बड़ा सुख पाओ


आओ, आओ, बोली लगाओ ।


यहाँ सब बिकता है, जितना लगाओगे


गारण्टी हमारी है, उससे दोगुना पाओगे ।


जनाब, ये रिश्‍ते क्या हैं, इन्हें दाँव पर चलिए


सीढ़ी बना कर आगे बढ़िए ।


भावनाओं का अब काम नहीं है ।


नैतिकता, मौलिकता,


दया, प्रेम, विश्‍वास और न्याय,


ये क्या करते हो


आना और गिन्नी का नहीं


ये डालर का जमाना है,


कोई बड़ा दाँव चलिए


कीमती है जो, वो बात कहिए ।


बोलो अपना चेहरा बेचोगे ?


बदले में देखो कितने मुखौटे पाओगे


ये खुशी का, ये सुख का


और ये मुखौटा रुतबे का


एकदम बढ़िया, इसे लगाओ तो


कोई नहीं पहचानेगा


मुखौटे के पीछे का दर्द कोई नहीं जानेगा ।


तुम भी जब ये मुखौटा लगाओगे,


सच कहता हूँ


अपना चेहरा भूल जाओगे ।


फिर कहता हूँ, मौके की बात है


डिस्काउण्ट भी साथ है


चलिए, कुछ बड़ा दाँव चलिए


कुछ न हो तो खुद को चलिए


यह बाजार है, यहाँ सब बिकता है


अपने सपने, इच्छाएँ अपनी


उम्मीदें, साँसें अपनी


दिन, रात, हर चीज की कीमत है


जितना बेचोगे, उससे ज्यादा पाओगे


फिर एक दिन


तुम भी बाजार हो जाओगे ।


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11/24/2008

चिट्ठी



।। चिट्ठी ।।


कब आती हैं ज्यादा चिट्ठियां


सुख में, दुख में


बसन्त या पतझड़ में ?


किसे रहता है चिट्ठी का


सबसे ज्यादा इन्‍तजार


शहर गए बेटे को,


घर में रह गए माँ-बाप को


प्रेमी को, विरहणी नायिका को


या नौकरी तलाशते युवा को ?


कब लिखी जाती हैं


सबसे ज्यादा चिट्ठियाँ


बचपन में, जवानी में


बुढ़ापे में ?


कब मिलता है


सबसे ज्यादा सुख


चिट्ठी लिखने में या चिट्ठी पाने में ?


पूरी पीढ़ी इस बात से अनजान है


लाख टके के सवाल पर हैरान है ।


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11/23/2008

ब‍हुत दिनों बाद



।। बहुत दिनों बाद ।।

बहुत दिनों बाद,

आज डाकिया मेरे घर आया


और छोटी का खत लाया ।

उसने लिखा,

‘‘पापा की तबीयत ठीक है

भय्यू पढ़ाई करता है

सभी याद करते हैं ।

घर कब आओगे भइया ?’’

फोन पर कहाँ होता है यह सब

कहाँ कह पाते हैं वह
जो बह रहा है दिल-दिमाग में ।

नहीं जान पाते हम कि

बाबूजी क्यों परेशान हैं

जीजी का घुटना दर्द करता है

काम से रात गए लौटते हैं मामा

और, तल्लीन बहुत उधम करता है ।

फोन पर कहाँ मालूम होता है कि

इस बार खूब पकी है

पड़ोस वाले जीजाजी की आँवली

नानी अब सयानी हो गई है

टूट कर गिर गया है

आँगन का बरसों पुराना नीम

कि पास वाले बा’ साहब की

खाँसी बढ़ गई है ।

आज जब खत आया

जैसे पूरा घर मेरी हथेलियों पर था ।

‘‘भइया कब घर आओगे ?’’

लगा सभी बाट जोह रहे हैं ।

उसने लिखा

‘‘फूलों से लदी है चमेली’’

पूरा कमरा खुबू से भर गया जैसे ।
आज बहुत दिनों बाद

डाकिया मेरे घर आया,

और छोटी का खत लाया ।

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