3/11/2009

आज भी

समय बदला
परिस्थितियाँ बदलीं
लेकिन / लगता है
सब कुछ पहले सा है
आज भी

सत्तू / जिसकी हो चुकी शादी
और दो बच्चे भी
भटक रहा है
काम की तलाश में
आज भी

प्रो. चौहान / हो गए उस वृक्ष की मानिन्द
जो बड़ा होने के बाद झुक जाता है
और / फलों के साथ देता है छाया
पहले से मृदु और ‘सरल’
आज भी ।

प्रवीण / अकेले ही झेल रहा
जिन्दगी के थपेड़े
उस नाव की मानिन्द
जो फँस गई भीषण तूफान में
फिर भी खे रहा है

जीवन की नैया
आज भी ।

दीपक / जिसकी प्रतिपल हो रही
रोशनी मद्धिम
कर रहा है संघर्ष
तूफानी हवाओं से
आज भी ।

बापू / धका रहे जीवन की गाड़ी
सत्तर की स्पीड में
बेटे का बोझ काँधों पर लिए
एक जो नहीं रहा
एक जो होकर भी, है नहीं
आज भी ।


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संजय परसाई की एक कविता

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4 comments:

  1. आज होली पर इतनी गंभीर रचना??


    -आपको होली की मुकारबाद एवं बहुत शुभकामनाऐं.
    सादर
    समीर लाल

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  2. प्रसंशनीय रचना !!!!

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  3. अमूल्य रचना, आप को होली की बहुत बहुत बधाई

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