2/21/2009

बरसों बाद गाँव गया

बरसों बाद
गाँव गया
सब चिर-परिचित
चेहरे दिखे
सब पहले सा न था
वो बच्चे जो छोटे थे
अब बड़े हो गए
कभी गोद से
न उतरने वाले
अचरज से देखते
पौधे पेड़ बन चुके थे
शायद वो अब भी
मुझे पहचानते
झूम कर दे रहे
अपना परिचय
लेकिन
वो बरगद का पेड़
न दिखा
एक लम्बे इतिहास का गवाह
बरगद
आज खुद इतिहास बन गया
मोती भी अब न रहा
शेर सी बलिष्ठ काया का मोती
किसी गाड़ी के नीचे आ
छोड़ गया अपनी यादें
उण्डवा नदी ने भी बदल दी
अपनी राह
ऊपर से
सूखे ने चला दिया दराँता
धरती की फटी छाती
और उसमें से निकलती आग
उसकी प्यास का
अहसास करा रही है
बस स्टैण्ड भी चला गया
एक किलोमीटर दूर
बन गया एक नया गाँव
प्रकाश नगर
सड़क/जो हुई थी बननी शुरु
.....

संजय परसाई की एक कविता


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5 comments:

  1. बरसों बाद
    गाँव गया
    सब चिर-परिचित
    चेहरे दिखे
    सब पहले सा न था
    वो बच्चे जो छोटे थे
    अब बड़े हो गए
    कभी गोद से
    न उतरने वाले
    अचरज से देखते
    पौधे पेड़ बन चुके थे
    dil ko chu gai apki rachana

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  2. फ़ालो करें और नयी सरकारी नौकरियों की जानकारी प्राप्त करें:
    सरकारी नौकरियाँ

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  3. समयचक्र: चिठ्ठी चर्चा : चिठ्ठी लेकर आया हूँ कोई देख तो नही रहा हैबहुत अच्छा जी
    आपके चिठ्ठे की चर्चा चिठ्ठीचर्चा "समयचक्र" में
    महेन्द्र मिश्र

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  4. gaaoN ki kisi amoolya dharohar si
    bahut hi sundar rachna.....
    abhivyakti mei samay ke badlaav ke parinaam
    (achhe-bure sb) saaf jhalakte haiN.
    badhaaee svikaareiN. . . .
    ---MUFLIS---

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