4/16/2009

हाथों की लकीरें

चूल्हा-चौका, झाडू-बर्तन और हाथों की लकीरें,
बन्द कोठरी बदबू-सीलन और हाथों की लकीरें।

सास -ननदें, पति-देवर और जो भी शेष है,
सहन करती सबकी झिड़कन और हाथों की लकीरें।

कहा था माँ-बाप ने उसको अपना घर समझना,
यहाँ मन से दूर है मन और हाथों की लकीरें ।

है अनुपम भाग इसका, पण्डितों की ही ज़ुबाँ थी,
सहन करती करुण-क्रन्दन और हाथों की लकीरें ।

याद आते बहुत वे पल जो सहेली संग गुज़ारे,
अब तो हर पल वही अनबन और हाथों की लकीरें ।

फटी धोती से ढका तन और माथे पर शिकन,
देख उसको नम है दरपन और हाथों की लकीरें ।
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आशीष दशोत्तर ‘अंकुर’ की एक गजल



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3 comments:

  1. किसी की पँक्तियाँ याद आ रहीं हैं कि-

    इतना भी यकीन न कर आपनी हाथ की लकीरों पर।
    किस्मत तो उनके भी होते जिनके हाथ नहीं होते।।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं।
    कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।।
    www.manoramsuman.blogspot.com
    shyamalsuman@gmail.com

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  2. सुन्दर रचना है\बधाई।

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  3. agar ap hatho ki lakiro k bare me janna chahte hai to shyamlal g se apne amuly jivan k bare me jane samay k chamkile mathe par har rat swapn me shok geet gate hue chand par kathak nachne vali ladki k pathrile shabdo ki bagavat kare.... uske bad kadva sach hai k buda kavi kehta hai k fir manav pe amrit dhara barsegi........... namashkar....

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