5/11/2009

आशियाँ अब तो बना लो

हकीक़त से आज सटकर,
लीक से देखा है हटकर ।

दृश्य बतलाने लगा है,
बात अपनी ही उलटकर ।

पाप है उनके दिलों में,
बात करते जो मटककर ।

हमसफर जिसको बनाया,
चला है दामन झटककर ।

आया है दरिया भी देखो,
आँख में अपनी सिमटकर ।

आशियाँ अब तो बना लो,
खूब देखा है भटककर ।
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आशीष दशोत्तर ‘अंकुर’ की एक गजल

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3 comments:

  1. आशीष भाई छाये हैं गिलो दिमाग पर.

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  2. गिलो = दिलो!! :)

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  3. बहुत ही उम्दा रचना के लिए बधाई...

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