3/01/2009

सब मिलकर

सोचता हूँ डर न होता

तो क्या डरपोक भी न होता

मैं एक भीरू समय मे जी रहा


दुर्घटना का चश्मदीद होकर भी

खिसक लेता हूं मुँह पलटकर

भ्रातृ में नजर आती है घात

अर्ध्‍दांगी की भंगि में

दिखाई देता है दुश्मन


हर कदम पर

पीछा करती एक परछाई


मैं एक भीरू समय में जी रहा हूँ


अकेले चने की नियति जानकर भी

उच्च रक्तचाप की भाड़ में

उछलता रहता हूँ

कभी तो और दाने भी आएँगे

और तब सब मिलकर

फोड़ेंगे इसे.
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प्रगतिशील कवि जनेश्वर के ‘सतत् आदान के बिना शाश्वत प्रदाता के शिल्प में’ शीर्षक से शीघ्र प्रकाश्य काव्य संग्रह की एक कविता



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