3/31/2009

हे! प्रिये तुम क्या गई

हे! प्रिये
तुम क्या गई
कर गई जीवन में अंधेरा
न तुम्हारे बिना चैन
न मन को राहत
बस तुम्हारे ही लौटने का
रहता है इन्तजार
क्योंकि तुम्हारे बगैर
नहीं बढ़ सकते हमारे कदम
तुम रहती हो / तो
रोशन रहता है
घर - आँगन
तुम्हारे बगैर
काटने को दौड़ती है
हँसी वादियाँ भी
तुम्हारे बगैर
बच्चे रहते है उदास
घर के बूढ़े भी
करते है तुम्हारी आस
तुम्हारे चले जाने से
मन का ही नहीं
घर का आँगन भी
सूना - सूना लगता है
लौट आओ जल्दी
अब नहीं सही
जाती
तुम्हारी जुदाई
तुम्हारा रुठना
बिगाड़ सकता है
बच्चों का भविष्य
क्योंकि/किसी को हो न हो
उन्हें जरुरत है तुम्हारी
हम तो गुजार लेंगे/अपनी रातें
छुटकी के साथ
लेकिन
बू़ढ़ी दादी की
जाती हुई आँखों की रोशनी को
तुम्हीं दे सकती हो सहारा
अब रुठना छोड़
लौट भी आओ
और कर दो रोशन
घर आँगन
बिजली रानी ।
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संजय परसाई की एक कविता



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3/30/2009

दीया जलाने का समय

सागरमल परमार की बूढ़ी माँ
लगाती है भगवान को दीया ठीक
इधर जब अजान होती है छः बजे

दीया जलता रहता है धीमे-धीमे
पास ही मस्जिद में हो रही इबादत में
शरीक होता हुआ

लगता है रसूल-उल-अल्लाह और कन्हैया बैठे हैं
जमुना तट पर,
कान्हा बाँसुरी बजा रहा है
और मुहम्मद बाँच रहे हैं कोई कविता

धेनुएँ चर रही हैं
और कालिन्दी बही चली जा रही है
या फिर ऐसा लगता है
कि दूर-दूर ब्याही बहनें एक साथ
पीहर में आई हैं

सागरमल की बूढ़ी माँ लगाती है
भगवान को दीया
ठीक छः बजे
जब इधर मस्जिद में हो रही होती है
अज़ान
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रचना दिनांक 25-12-2000

रतन चौहान : 6 जुलाई 1945, गाँव इटावा खुर्द, रतलाम, मध्य प्रदेश में एक किसान परिवार में जन्म।
अंग्रेज़ी और हिन्दी में स्नातकोत्तर उपाधि।
प्रकाशित कृतियाँ- (कविता संग्रह हिन्दी) : अंधेरे के कटते पंख, टहनियों से झाँकती किरणें।
(कविता संग्रह, अंग्रेजी) : रिवर्स केम टू माई डोअर, ‘बिफोर द लिव्ज़ टर्न पेल’, लेपर्डस एण्ड अदर पोएम्ज़। हिन्दी से अंग्रेजी में पुस्तकाकार अनुवाद : नो सूनर, गुड बाई डिअर फ्रेन्ड्स, पोएट्री आव द पीपल, ए रेड रेड रोज़, तथा ‘सांग आव द मेन’। देश-विदेश की पत्रिकाओं में अनुवाद प्रकाशित।
साक्षात्कार, कलम, कंक, नया पथ, अभिव्यक्ति, इबारत, वसुधा, कथन, उद्भावना, कृति ओर आदि पत्रिकाओं में मूल रचनाओं के प्रकाशन के साथ-साथ दक्षिण अफ्रीका, यूरोप एवं रुस के रचनाकारों का अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद।
इंडियन वर्स, इंडियन लिटरेचर, आर्ट एण्ड पोएट्री टुडे, मिथ्स एण्ड लेजन्ड्स, सेज़, टालेमी आदि में हिन्दी के महत्वपूर्ण कवियों की कविताओं के अंग्रेजी अनुवाद।
एण्टन चेखव की कहानी ‘द ब्राइड' और प्रख्यात कवि-समीक्षक-अनुवादक श्री विष्णु खरे की कविता ‘गुंग महल’ का नाट्य रूपान्तर। ‘हिन्दुस्तान’ और ‘पहचान’ अन्य नाट्य कृतियाँ।
अंग्रेज़ी और हिन्दी साहित्य पर समीक्षात्मक आलेख।
जन आन्दोलनों में सक्रिय।
सम्प्रति - शासकीय स्नातकोत्तर कला एवं विज्ञान महाविद्यालय, रतलाम में अंग्रेजी के प्राध्यापक पद से सेवा निवृत।
सम्पर्क : 6, कस्तूरबा नगर, रतलाम (मध्य प्रदेश) 457001. दूरभाष - 07412 264124


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3/29/2009

आँसू

आँसू
हैं मेरे सच्चे साथी
बिन बुलाए आ जाते
खुशी व गम के मेरे
क्षणों को बाँटने

बिना किसी
मान-मनुहार के कर जाते
मेरा गम हल्का

खुद का अस्तित्व
समाप्त कर।
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संजय परसाई की एक कविता

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3/28/2009

आओ कुछ करें

रास्ता सुनसान, आओ कुछ करें,
मुसीबत में जान, आओ कुछ करें ।

एक भी होता शज़र तो ठीक था,
सामने मैदान आओ कुछ करें ।

बात होठों पर कोई आती नहीं,
दिल में इक तूफान आओ कुछ करें ।

सत्य अंधियारे में दम है तोड़ता,
झूठ सरेआम आओ कुछ करें ।

साज़िशों के बीच ‘आशीष’ है नहीं,
खो गया इंसान आओ कुछ करें ।
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आशीष दशोत्तर ‘अंकुर’ की एक गजल



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3/27/2009

बावनगजा

सतपुड़ा की प्राचीन पहाड़ियों में खड़े
निरावरण बावनगजा
तीर्थंकर भव्य और अपराजेय !

तुम्हें किसी धर्म या सम्प्रदाय में बाँधकर
मैं छोटा नही कर सकता मनुष्यता
(क्योंकि सब धर्मों से बढ़कर है मनुष्यता)
और कला की विराट और दुर्दमनीय भूख।

मैं नहीं जानता
किन आदिम शिल्पियों ने तुम्हें उकेरा
इतना महान् और अप्रतिम,
पर यह तय है कि वे खुरदरे पहाड़ों में छोड़ गए
मनुष्य के मनुष्य होने का प्रमाण।

हमारी तमाम संकीर्णताओं और क्षुद्र आकांक्षाओं को
चुनौती देती यह ऊर्जस्वित काया, मस्तक उन्नत,
बलिष्ठ भुजाएँ, होंठों पर यह अविजित मुस्कान।

कलाभिव्यक्ति कितनी जोखिमभरी होती है
और कितनी रसवन्ती हो जाती है
मानवीय मूल्यों में नहाकर।

तीर्थंकर, तुम्हारी देह, तुम्हारे अण्डकोषों में भी
मधुमक्खियों ने बाँध लिए हैं अपने छत्ते!
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रचना दिनांक 10 नवम्बर 2002

रतन चौहान : 6 जुलाई 1945, गाँव इटावा खुर्द, रतलाम, मध्य प्रदेश में एक किसान परिवार में जन्‍म।
अंग्रेजी और हिन्दी में स्‍नातकोत्‍तर उपाधि।
प्रकाशित कृतियाँ- (कविता संग्रह हिन्दी) : अंधेरे के कटते पंख, टहनियों से झाँकती किरणें
(कविता संग्रह, अंग्रेजी): रिवर्स केम टू माई डोअर, ‘बिफोर द लिव्ज़ टर्न पेल’, लेपर्डस एण्ड अदर पोएम्ज़, हिन्दी से अंग्रेजी में पुस्तकाकार अनुवाद : नो सूनर, गुड बाई डिअर फ्रेन्ड्स, पोएट्री आव द पीपल, ए रेड रेड रोज़, तथा ‘सांग आव द मेन’।
देश-विदेश की पत्रिकाओं में अनुवाद प्रकाशित।
साक्षात्‍कार, कलम, कंक, नया पथ, अभिव्यक्ति, इबारत, वसुधा, कथन, उद्भावना, कृति ओर आदि पत्रिकाओं में मूल रचनाओं के प्रकाशन के साथ-साथ दक्षिण अफ्रीका, यूरोप एवं रुस के रचनाकारों का अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद।
इण्डियन वर्स, इंडियन लिटरेचर, आर्ट एण्ड पोएट्री टुडे, मिथ्स एण्ड लेजन्ड्स, सेज़, टालेमी आदि में हिन्दी के महत्वपूर्ण कवियों की कविताओं के अंग्रेजी अनुवाद।
एण्‍टन चेखव की कहानी ‘द ब्राइड' और प्रख्यात कवि-समीक्षक-अनुवादक श्री विष्णु खरे की कविता ‘गुंग महल’ का नाट्य रूपान्तर। ‘हिन्दुस्तान’ और ‘पहचान’ अन्य नाट्य कृतियां।
अंग्रेजी और हिन्दी साहित्य पर समीक्षात्मक आलेख।
जन आन्दोलनों में सक्रिय।
सम्प्रति - शासकीय स्नातकोत्तर कला एवं विज्ञान महाविद्यालय, रतलाम में अंग्रेजी के प्राध्यापक पद से सेवा निवृत।
सम्पर्क : 6, कस्तूरबा नगर, रतलाम (मध्य प्रदेश) 457001. दूरभाष - 07412 264124


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3/26/2009

आँसू

मायूसी के क्षणों में
आ जाते है
सच्चे हमदम बन

गालों पर लुढ़क
सहलाते
गम को बाँटने का
प्रयास करते,

जब छोड़ देते
सब साथ
तो बिन बुलाए
आ जाते
मेरे गम को / सहेजने, समेटने
सच्चे साथी का
फर्ज निभाने
आँसू !
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संजय परसाई की एक कविता

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3/25/2009

प्यार से बेहतर नहीं कुछ

वक्त़ के हर मोड़ पर हम मुस्कुरा कर देख लें ,
ज़िन्दगी के गीत को यूँ गुनगुना कर देख लें ।

एक इंसानी बनाएँ क़ौम मिलकर साथ में,
ईद-होली और दिवाली को मिलाकर देख लें ।

तेरा-मेरा, इसका-उसका, क्या-कहाँ रह जाएगा,
इस नजर से इन गुबारों को हटा कर देख लें ।

फ़ासले जो बढ़ रहे हैं आज अपने दरमियाँ,
इन दिलों को आज तो नज़दीक लाकर देख लें ।

प्यार से बेहतर कभी कुछ हो नहीं सकता यहां,
प्यार का पैग़ाम ही सबको सुनाकर देख लें ।
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आशीष दशोत्तर ‘अंकुर’ की एक गजल

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3/24/2009

सिक्के

उस बूढ़े इतिहासकार ने
लगा दी अपनी गाढ़ी कमाई
और खून

चाँदी ताँबे और लोहे के सिक्कों में

वह लकड़ी का बक्सा
गोया कोई अजायबघर था
निकल रही थी उससे
सल्तनतें

दो हजार साल पुराने
युग सम्राट, शहंशाह,सुल्तान
जिनके जुल्म अंकित थे
इतिहास की किताबों में
और मनुष्यों की स्मृतियों में

मुझे नहीं मालूम
आख़िर वह बूढ़ा
क्या करना चाहता था
उन सल्तनतों से उलझ कर,
उन शाहों को अपनी यादों में
बरकरार रख कर

अलबत्ता यह जरूर है कि उन सिक्कों के
चेहरों पर मुकुटधारी माथों के साथ
अंकित थी धान की बालियां भी,
सूरज हालैण्ड का
और पवनसुत हनुमान भी रामायण वाले

मुदर्रिसी और स्कूल के स्टेज पर
पोरस, सिकन्दर का पार्ट करते करते
इतिहास के बरामदों में आ गया वह
पुराना शोधार्थी
गपिया रहा था न मालूम कब जन्मे
उन ब्यौपारियों से
जिन्होंने ही सबसे पहले ईज़ाद किये
सिक्के
बाद में सम्राटों की शमशीरें चमकी
सिक्कों पर (वह बता रहा था)

और अब? मैने उत्सुकतावश पूछ ही
लिया उस बूढ़े पुराविद से

गोरी, तुग़लक, बलबन,सुल्तान मालवा के,
राजे रजवाड़े,
दीनार, दरहम, डालर,फ्रैंक, लीरा

दुनिया सिमट आई थी पंच-कमरा
उस छोटे से मकान में

वहाँ खून था, साम्राज्य थे
और उगते सूरज में गीत गाती
फसलें भी

दीमक खाए गलियारों से बाहर
नदी बह रही थी सिक्के पर,
और बूढ़े के चेहरे पर भी
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रचना दिनांक 9.11.1999



रतन चौहान : 6 जुलाई 1945, गाँव इटावा खुर्द, रतलाम, मध्य प्रदेश में एक किसान परिवार में जन्म।

अंग्रेज़ी और हिन्दी में स्नातकोत्तर उपाधि।

प्रकाशित कृतियाँ- (कविता संग्रह हिन्दी) : अंधेरे के कटते पंख, टहनियों से झाँकती किरणें, तुरपई
(कविता संग्रह, अंग्रेजी) : रिवर्स केम टू माई डोअर, ‘बिफोर द लिव्ज़ टर्न पेल’, लेपर्डस एण्ड अदर पोएम्ज़, हिन्दी से अंग्रेजी में पुस्तकाकार अनुवाद : नो सूनर, गुड बाई डिअर फ्रेन्ड्स, पोएट्री आव द पीपल, ए रेड रेड रोज़, तथा ‘सांग आव द मेन’।
देश-विदेश की पत्रिकाओं में अनुवाद प्रकाशित ।
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3/23/2009

आग

एकटक निहार रही थी
वह पेड़ की झूलती
डालियों को
न कडकड़ाती धूप
की चिन्ता
न हवा की
बस निगाहें टिकी थीं
उस झूलती डाली
के साथ
झूलते आम पर
जो हवा के तेज
झोंके के साथ टपक प़ड़ेगा
जमीन पर
और वह बुझा लेगी
अपनी पेट की आग।
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संजय परसाई की एक कविता

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3/22/2009

मुल्क को ही डँस रहे

देश है उनके हवाले दोस्तों,
निकाले जिनने दिवाले दोस्तों ।

इन सियासी गुफाओं में कुछ नहीं,
शेष हैं बस भ्रष्ट जाले दोस्तों ।

धवल वस्‍‍त्रों में छिपे शैतान हैं,
दुश्मनों के हम निवाले दोस्तों ।

आज अपने मुल्क को ही डँस रहे,
साँप हमने जो थे पाले दोस्तों।

हर कदम पर थीं कभी नदियाँ जहाँ,
अब दिखाई दे रहे हैं, नाले दोस्तों ।

क्या पढ़े ‘आशीष’ कोई अखबार में,
पृष्ठ दर पृष्ठ हैं घोटाले दोस्तों ।

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आशीष दशोत्तर ‘अंकुर’ की एक गजल



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3/21/2009

खरमोर

मिलिन्द डाँगे और मैं
देखना चाहते थे खरमोर
सैलाना की अरण्य भूमि में

देखना चाहते थे अद्भुत पक्षी की
प्रणय लीलाएँ
पंखों को फैलाकर
उसका आकाश में उठ जाना
और नीला बादल बनकर
रीझाना अपनी प्रिया को
हम घुसे ऊबड़-खाबड़ ज़मीनों में,
लम्बी घासों में,
हमने सरकण्डों को सूँघा

मालवे का भाट कुकड़ा
और सालिमअली का
ग्रेट इण्डियन बस्टर्ड
गूँज रहा था हमारे भीतर

भूखे प्यासे भटकते रहे हम
खेतों में

हम खरमोर देखना चाहते थे,
जीवित रखना चाहते थे
बरसों बरस
उस मनोहारी कलंगी वाले पक्षी को
अपने भीतर
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रचना दिनांक 29 जून 1999


रतन चौहान : 6 जुलाई 1945, गाँव इटावा खुर्द, रतलाम, मध्य प्रदेश में एक किसान परिवार में जन्म।

अंग्रेज़ी और हिन्दी में स्नातकोत्तर उपाधि।
प्रकाशित कृतियाँ- (कविता संग्रह हिन्दी) : अंधेरे के कटते पंख, टहनियों से झाँकती किरणें
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3/20/2009

दादाजी की छड़ी

कोने में खड़ी दादाजी की छड़ी
आज भी अहसास दिलाती है
उनके आसपास होने का

दुःख में सदैव उनके करीब
उनकी सच्ची हमदर्द रही
और
चलते फिरते समय
हमारे काँधे का प्रतीक
कभी दादाजी को संभालने वाली छड़ी
उनसे अलग होने का
अहसास नहीं होने देती

आज नौ वर्षों बाद भी
दादाजी के होने के अहसास को
संभाले खड़ी है कोने में

आज भी निभा रही
अपना धर्म
और / दाग रही है एक मूक प्रश्न
हमारे फर्ज को लेकर
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संजय परसाई की एक कविता

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3/19/2009

दुनिया सयानी बन गई

ज़िन्दगी की हर फिज़ा जब से सुहानी बन गई,
इस जहाँ की हर अदा बस जाफरानी बन गई ।

आदतन हमने सफर को हर समय जारी रखा,
रहगुज़र वो आज मंज़िल की निशानी बन गई ।

कल किसी के कत्ल का चर्चा रहा अखबार में,
आज तो वो बात जैसे इक कहानी बन गई ।

देखकर बेमानियाँ भी आदमी खामोश है,
ज़िस्म ठण्डा हो गया कैसी रवानी बन गई ?

आदमी को खोजने में हम जरा मसरुफ़ थे,
बस इसी दौरान ही दुनिया सयानी बन गई ।

आसमाँ के पर किसी ने काटकर बिखरा दिए,
उन परिन्दों की उड़ानें अब कहानी बन गई ।
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आशीष दशोत्तर ‘अंकुर’ की एक गजल


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3/18/2009

पदचापें

उसके भीतर एक किरण फूटती है मेरे लिये
और वह चली आती है यहाँ

भूगोलवेत्ता और पुरातत्वविद ढूँढ़ सकते हैं विलुप्त हो गई
सरस्वती
और समुद्र में अन्तर्धान हो गई द्वारिका के अवशेष
किन्तु तमाम तकनीकों और यन्त्रों से बाहर है
मन के गहरे और अंधेरे जंगल में अचानक उठी गमक

वह सौरभ सी बिखरती रहती है
आँखों ही आँखों में न मालूम क्या बात करती रहती है
सूख गये तालाब और धान के हरे खेतों से

कहीं से भी उठ सकती है हवा
कहीं भी कुछ सुलग सकता है कभी-भी

अनन्त दरवाज़ों के पीछे खड़ी वह जलती रहती है
निःशब्द

दहकते पलाश के दिन हों या मेघाच्छन्न आकाश की भोर
या हवाएँ शीत का उजास भरी
न मालूम क्या पुकारती हुई
वह चली आती है

उस निर्विकार के साथ कोई नन्हीं सी चिड़िया गाती रहती है
कोई अबूझा गीत

कितने हज़ार साल से सूरज सुन रहा है
उसकी पदचापें
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रचना दिनांक 5 मई 2005


रतन चौहान : 6 जुलाई 1945, गाँव इटावा खुर्द, रतलाम, मध्य प्रदेश में एक किसान परिवार में जन्म।

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एण्टन चेखव की कहानी ‘द ब्राइड' और प्रख्यात कवि-समीक्षक-अनुवादक श्री विष्णु खरे की कविता ‘गुंग महल’ का नाट्य रूपान्तर।

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3/17/2009

बहुत अच्छा लगता है

बहुत अच्छा लगता है
बच्चों के साथ रहना
तुतलाना / खेलना
कभी घोड़ा बन
पीठ पे लादे बरामदे में घूमना
तो कभी गुब्बारों के साथ
उछलना / और
चाबी वाली मोटर के पीछे भागना

बहुत अच्छा लगता है
रोते हुए बच्चे को
चन्दा मामा कहकर बहलाना
या आइसक्रीम खिलाकर चुप करना

बहुत अच्‍‍‍छा लगता है
बर्थ डे पर बच्चों का
केरम, वीडियो गेम
साँप-सीढ़ी, या जीन्स के लिए जिद करना
और / ना - नुकुर करने पर
उछलना, रोना, पैर पटकना
या चीजों का तोड़ना फोड़ना।
बहुत अच्छा लगता है
अपने अधिकारों के लिए
जीत की उम्मीद के साथ
नन्हें हाथों को
आवेश के साथ ऊपर उठते हुए देखना

और एक अच्छे मालिक सा
मूक हो सब मानता जाता हूँ मैं
और देता जाता हूँ कर्तव्य की गाँठ खोल
बिना नापे तोले अधिकारों के पीस

इस मंशा के साथ / कि
अधिकारों की इस आग को
जलाए रखेंगें
अपने अधिकारों के उपयोग होने तक ।
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संजय परसाई की एक कविता


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3/16/2009

जानते हैं

आज है मौसम सुहाना जानते हैं,
दिल तभी है शायराना जानते हैं ।

तुम दिलों की दूरियॉं ही देखते हो,
हम दिलों को पास लाना जानते हैं ।

इस मकाँ से जो चले गए हैं उठकर,
उनको हम फिर से बुलाना जानते हैं ।

रकीबों के बीच बैठे हैं मग़र,
गीत उल्फ़त के सुनाना जानते हैं ।

आए ना ‘आशीष’ हमारी महफिलों में,
आपका हर इक बहाना जानते हैं ।

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आशीष दशोत्तर ‘अंकुर’ की एक गजल


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3/15/2009

माँ के लगाए गए सहजन में

ख्यात प्रगतिशील कवि रतन चौहान ने, मेरे चिट्ठे पर अपनी कविताएँ प्रकाशित करने की अनुमति देकर और तदनुसार अपनी कुछ कविताएँ उपलब्ध करवा कर मुझे और मेरे चिट्ठे को सम्मान ही प्रदान किया है। मैं उनका आभारी हूँ।
रतन चौहान की कविताएं हैं तो रतन चौहान की ही किन्‍तु उन्हें पढना शुरु करने के पहले ही क्षण से अनुभूति होने लगती है कि ये कविताएँ कहीं न कहीं हमारे भीतर से ही बाहर आ रही हैं। ख्यात कवि राजेश जोशी के मुताबिक ‘हमारे छोटे शहरों और कस्बों के जन संकुल समाज की तरह ही उनकी कविता में बहुत सारे लोग हैं, उनके दुख-सुख हैं, उनकी बोली बानी है और उनके बतियाने को हर पल महसूस करती ध्वनियाँ हैं।’ और यह कि ‘इन कविताओं को पढ़ते हुए लगता है जैसे आप शब्दों के बीच से नहीं, लोगों के बीच से गुजर रहे हों।’
ऐसी ही कुछ कविताएँ, नियमिति अन्तराल से इस चिट्ठे पर उपलब्ध होती रहेंगी।

माँ के लगाए गए सहजन में
फूल आ गए हैं

उसकी नर्म टहनियाँ
वसन्त हो गई हैं

अब अब कुछ ज़्यादा काँपने
लग गए माँ के हाथों ने
इसे अपनी सहोदर धरती
की कोख में रोपा था दो एक ऋतु पहले

झुर्रियों से भरी माँ की उंगलियों को छूकर
धरती आर्द्र हो गई थी

सहजन बूढ़ी माँ का बेटा
है
ग्रीष्म की लू लपट में
माँ की स्मृतियों को छाँह देता हुआ

सहजन में फूल आ गए हैं
माँ नहीं है

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रचना दिनांक 4 फरवरी 1999


रतन चौहान -
6 जुलाई 1945, गाँव इटावा खुर्द, रतलाम, मध्य प्रदेश में एक किसान परिवार में जन्म।
अंग्रेज़ी और हिन्दी में स्नातकोत्तर उपाधि।
प्रकाशित कृतियाँ- (कविता संग्रह हिन्दी) : अंधेरे के कटते पंख, टहनियों से झाँकती किरणें, तुरपई
(कविता संग्रह, अंग्रेजी) : रिवर्स केम टू माई डोअर, ‘बिफोर द लिव्ज़ टर्न
पेल’, लेपर्डस एण्ड अदर पोएम्ज़,
हिन्दी से अंग्रेजी में पुस्तकाकार अनुवाद : नो सूनर, गुड बाई डिअर फ्रेन्ड्स, पोएट्री आव द पीपल, ए रेड रेड रोज़, तथा ‘सांग आव द
मेन’।
देश-विदेश की पत्रिकाओं में अनुवाद प्रकाशित ।
साक्षात्कार, कलम, कंक, नया पथ, अभिव्यक्ति, इबारत, वसुधा, कथन, उद्भावना, कृति ओर आदि पत्रिकाओं में मूल रचनाओं के प्रकाशन के साथ-साथ दक्षिण अफ्रीका, यूरोप एवं रुस के रचनाकारों का अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद ।
इंडियन वर्स, इंडियन लिटरेचर, आर्ट एण्ड पोएट्री टुडे, मिथ्स एण्ड लेजन्ड्स, सेज़, टालेमी आदि में हिन्दी के महत्वपूर्ण कवियों की कविताओं के अंग्रेजी अनुवाद।
एण्टन चेखव की कहानी ‘द ब्राइड और प्रख्यात कवि-समीक्षक-अनुवादक श्री विष्णु खरे की कविता ‘गुंग महल’ का नाट्य रूपान्तर। ‘हिन्दुस्तान’ और ‘पहचान’ अन्य नाट्य कृतियाँ
अंग्रेजी और हिन्दी साहित्य पर समीक्षात्मक आलेख।
जन आन्दोलनों में सक्रिय।
सम्प्रति - शासकीय स्नातकोत्तर कला एवं विज्ञान महाविद्यालय, रतलाम में अंग्रेजी के प्राध्यापक पद से सेवा निवृत।
सम्पर्क : 6, कस्तूरबा नगर, रतलाम (मध्य प्रदेश) 457001. दूरभाष - 07412 264124

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3/14/2009

मंजिल

रोज सुबह
निकल पड़ती है वो
एक नई मंजिल की तलाश में
खड़ी हो जाती है / एक चौराहे पर
और धीरे - धीरे
शामिल हो जाती है
उस भीड़ में
जिसमें सबको तलाश है
अपनी मंजिल की।

मंजिल / जो दुरुह तो है
लेकिन क्षणिक भी


कुछ समय के बाद

मंजिल मिलती है / लेकिन



उसको यह पता नहीं होता

कि आज क्या करेगी



तगारी उठाएगी
फावड़ा चलाएगी
या किसी समारोह की
जूठी प्लेटें धोएगी


सोचता हूँ/क्या यही मंजिल है
इन काली लड़कियां की ...... ?
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संजय परसाई की एक कविता




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3/13/2009

जल रहा है आदमी

खौफ़ के साये में जो पल रहा है आदमी,
कायरों की शक्ल में ही ढल रहा है आदमी ।

मुस्कुराने की उसे आदत है वो मुस्काएगा
दिल ही दिल में किस कदर जल रहा है आदमी ।

वो कतारें नामालूम ले जाती है कहाँ,
नाक की ही सीध में चल रहा है आदमी ।

जानता है सब मग़र खामोश है इस तरह,
ना ही कोई प्रश्न ना ही हल रहा है आदमी ।

वायदों के जाल में फँस उलझ कर रह गया,
आज तो हर आदमी को छल रहा है आदमी ।

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आशीष दशोत्तर ‘अंकुर’ की एक गजल

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3/12/2009

झूठ-सच विकृत हुए

अब कहीं अवसर नहीं है,
राह है रहबर नहीं है ।

पाँव में छाले पड़े हैं,
कोई भी सहचर नहीं है ।

दूर तक मैदान देखो
एक भी तरुवर नहीं है ।

गूँजती हैं सब दिशाएँ
राग पर सस्वर नहीं है ।

झूठ-सच विकृत हुए हैं,
कोई भी अन्तर नहीं है ।

ज़िन्दगी के बीहड़ों में,
एक भी ‘अंकुर’ नहीं है ।
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आशीष दशोत्तर ‘अंकुर’ की एक गजल
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3/11/2009

आज भी

समय बदला
परिस्थितियाँ बदलीं
लेकिन / लगता है
सब कुछ पहले सा है
आज भी

सत्तू / जिसकी हो चुकी शादी
और दो बच्चे भी
भटक रहा है
काम की तलाश में
आज भी

प्रो. चौहान / हो गए उस वृक्ष की मानिन्द
जो बड़ा होने के बाद झुक जाता है
और / फलों के साथ देता है छाया
पहले से मृदु और ‘सरल’
आज भी ।

प्रवीण / अकेले ही झेल रहा
जिन्दगी के थपेड़े
उस नाव की मानिन्द
जो फँस गई भीषण तूफान में
फिर भी खे रहा है

जीवन की नैया
आज भी ।

दीपक / जिसकी प्रतिपल हो रही
रोशनी मद्धिम
कर रहा है संघर्ष
तूफानी हवाओं से
आज भी ।

बापू / धका रहे जीवन की गाड़ी
सत्तर की स्पीड में
बेटे का बोझ काँधों पर लिए
एक जो नहीं रहा
एक जो होकर भी, है नहीं
आज भी ।


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3/10/2009

मैंने नहीं देखा समुद्र

आज तक देखने की साध लिए मन में
मैंने देखा नही समुद्र, ठीक समुद्र की तरह, उससे
उतना ही दूर हूँ,
जितने दूर हैं मुझसे मेरे अपने

उसे कतरा-कतरा जीते हुए भीतर और बाहर
मैंने जाना है उसका सौन्‍दर्य
इसीलिए भाते हैं मुझे
चक्र-सूर्य मन्दिर का और
अशोक-स्तम्भ के सिंह


खजुराहो हो या एलिफेण्टा
वहां भी लंगोटी और खाल से एकमेक
विधवा की मांग से सूने, सृजनरत हाथों के शिल्प
देखे हैं मैंने । और मुग्ध हुआ हूँ ।



तुम्हें देखने की साध लिए
तिलियों को देखा है
बसेरा और बारूद बनते हुए
ये उन्हीं वृक्षों की टहनियां हैं
जिन्हें सींचा है तुमने इतनी दूर रहकर भी
अपने मेघों के हाथों



इतने वरूणालयों की गत्यात्मकता के बीच
रहकर भी, तुम्हारा जिक्र आए न आए
स्मृति और सांस में बस गई है यह साध



अपने शेष जीवन की, एकमात्र तो नहीं
उत्कट अभिलाषा - तुम्हें देखूं
ठीक समुद्र की तरह तुम्हें ।
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प्रगतिशील कवि जनेश्वर के ‘सतत् आदान के बिना शाश्वत प्रदाता के शिल्प में’ शीर्षक से शीघ्र प्रकाश्य काव्य संग्रह की एक कविता



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3/09/2009

नन्हीं बूँदों का समन्दर

आज फिर आदमी को हमने दरबदर देखा,
अपनी बस्ती में जो जलता हुआ घर देखा ।

भूख अपनी तरसती रही निवाले को
और उनकी भूख को हर रोज़ हमने तर देखा ।

सुबह में आरती हर शाम अज़ान देता है,
रात में हमने उसी हाथ में खंज़र देखा ।

ख़्वाब में ही सही इस रोज़ दिखाई तो दिया,
अपनी आँखों ने भी खुशनुमा मंज़र देखा ।

ये सियासत रही नहीं अब काबिल,
रहनुमाओं को कभी बाहर-अन्दर देखा ।

उनकी ख्वाहिशों के पर बढ़ते ही रहे
मुफलिसों पर वक्त का कहर देखा ।

साथ चलने से हर वक्त जीत मिलती है ।
नन्ही बूँदों का हमने आज समन्दर देखा ।
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आशीष दशोत्तर ‘अंकुर’ की एक गजल



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3/08/2009

अपनापन

उस दिन
खूब जमकर रोया था 'प्रसन्न'
स्कूल न जाने के लिए

शायद दो दिन पूर्व का
उसका उत्साह
ठण्डा पड़ गया था,

वह नहीं छोड़ना चाहता था
दादा - दादी व पापा - मम्मी
और नन्हीं गुड़िया ‘प्रतीक्षा’ को।

शायद
अपनापन दबा रहा था
उसके उत्साह को


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संजय परसाई की एक कविता



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3/07/2009

हींग वाले पठान चाचा

वर्षों बाद सुनी
अफगानी आवाज
''हींग लेना, हींग''


पठान चाचा की दी हुई
हींग से ही लगता था - बघार
दाल में, तरकारी में


पंसारी की दुकान से घरों में
कभी आती नहीं थी
बघार की यह रानी


केसर के लिए विश्वसनीय
धरम-पेढ़ी
जड़ी बूटियों के लिए
अत्तार की दुकान


असली घी को भी लोग
मलकर देखते थे
हथेली की पुश्त पर लेकिन


गृहणियों के लिए
कसौटी थी
यह अफगानी मर्दाना आवाज

सेब से रक्तिम

ऊँचे - पूरे आजानुबाहु
सलवार और कुर्ते पर
जरीदार काला वास्कट
पठानी साफे पर पेंच संग तुर्रा
पैरों में अफगानी जूतियाँ


तब कितने अपने लगते थे
काबुल और कंधार
बादशाह खान और
यह हींग वाले पठान चाचा


परिवार से दूरस्थ
अपनी गृहस्थी बसाने के क्रम में
जैसे बहुत कुछ छूटा
पता नहीं छोंक से
कब विदा हुई - हींग


छूटी गठिया के दर्द की याद जो
माँ को सताया करता था
जाड़ों - भर


जेठ-वैशाख में पानी के लिए
सिर पर घड़े उठाए
माँ-बहनों का
इस चापाकल से
उस चापाकल दौड़ना


स्मृति से कब विदा हुए
बादशाह खान
कन्‍धार और काबुली खुबानिया
यह हींग वाले पठान चाचा तो
जैसे सुनी हुई कहानी
आज अचानक
हींग वाले पठान चाचा को
माँ की गृहस्थी और
पिता के पुराने मकान के पास
अपनी उसी ईमान की
बुलन्द आवाज में हेरते-देख
''हींग लेना, हींग''


याद आई
अमेरिका के युद्ध उन्माद की
तालिबान की याद आई
नृशंसताएँ और
बच्चों की जुबान पर
उन दिनों उच्चारे जाते
लादेन ...... लादेन ...... लादेन .....

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3/06/2009

मौसम

आज कितना है सुहाना मौसम,
यूँ तो जीने का बहाना मौसम ।

वो हक़ीकत भी मौसम ही था,
और अब देखो फ़साना मौसम ।

तुम तो जाने कहाँ बहते ही रहे,
एक कतरा भी बहा ना मौसम ।

है फसल की कशिश, फूल की भी,
पेड़-पौधों का तराना मौसम ।

आज देखा जो पीछे मुड़कर,
याद आया है पुराना मौसम ।

नफ़रती दौर में ‘आशीष’ चुप है,
दीप उल्फ़त के जलाना मौसम ।
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आशीष दशोत्तर ‘अंकुर’ की एक गजल

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3/05/2009

मासूम

जब भी देखती है वो
दौड़कर लिपट जाती है सीने से
और करने लगती है
मीठी- मीठी बातें
मान - मनुहार
और ढेर सारी शिकायतें
देरी से आने की ।


मैं भी चुपचाप
सुन लेता हूँ
क्योंकि
रोज-रोज तो आ नहीं सकता
मेरी भी अपनी मर्यादाएँ हैं
लोकलाज का ख्याल भी

कितनी मासूम है वो
कितना ख्याल रखती है अपनों का

और इन्हीं अपनों के लिए
न्यौछावर कर देती है
वो अपनी हँसी, अपनी खुशी

शायद यही सोचकर
कि उसकी थोड़ी सी हँसी
महका देगी जीवन की बगिया
और भर देगी
उसकी दीदी के जीवन में
ढेरों खुशियाँ।

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3/04/2009

यह फैसला अभी बाकी है

मिताक्षरा बन जाएगी

यह दुनिया एक दिन


जैसे खत्म हुई दूरियां

भाषा का कोष भी रीत जाएगा


जैसे नहीं रहेंगे

तुम्हारे खेत तुम्हारे

जैसे नहीं रहेंगे तुम्हारे

डांगर तुम्हारे


जैसे नहीं रहेंगे

तुम्हारे अपने तुम्हारे

जैसे नहीं रहेंगे तुम्हारे

सपने तुम्हारे


मिताक्षरा बन जाएगी

यह दुनिया एक दिन


लेकिन वह अक्षर

श्वेत दुनिया का होगा या स्याह दुनिया का

यह फैसला तो अभी बाकी है

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3/03/2009

फिजाँ में आ गई बहार

ऱफ्ता-ऱफ्ता फासले घटे
और दिल की बात हो गई,
उनसे अपनी ख़्वाब में सही
आज मुलाकात हो गई।



एक बुत को सामने रखा
और उसको दी है दुआ,
यूँ ही बीते अपने सारे दिन
और यूँ ही रात हो गई ।

ज़िन्दगी में ऩज्म वो बनी
और बन गई कभी ग़ज़ल,
वो बनी ज़मीं-औ' आसमाँ
वो ही कायनात हो गई ।

उसको अपने साथ क्या लिया
और ज़रा देर ही चला,
इस फिज़ाँ में आ गई बहार,
प्यार की बरसात हो गई ।

हर कदम पै’ रास्ते मिले तो
लगा कि और कुछ चलें,
चलते-चलते यूँ ही एक दिन
मंज़िलों से बात हो गई ।


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3/02/2009

अहम्

अहम्
अकेले नहीं चल सकता
उसे चलने के लिए चाहिए जमीन
किसी वस्तु, घटना या पद की

इन्हीं के सहारे
फैलता व बढ़ता है किसी लता सा
या आकाश की
ओर मुँह किए
खड़ा रहता है
निरे ठूंठ सा।

यह केवल ''मै'' का पक्षधर है
‘हम’ को शनि की (वक्र) निगाह से
देखता है
लेकिन / शायद
उसे पता नहीं होता
कि वो कितना दूर कर देता है
उस व्यक्ति को/ व्यक्ति से
जिसके सर चढ़ कर बोल रहा है

व्यक्ति यदि चेतन हो
साथ छोड़ना भी चाहे
तो नहीं देता मौका

बस चलता रहता है
साये सा हरदम साथ
और व्यक्ति भी
न चाहते हुए
हो जाता है
अपनों से दूर......
बहुत .......दूर ===
-----



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3/01/2009

सब मिलकर

सोचता हूँ डर न होता

तो क्या डरपोक भी न होता

मैं एक भीरू समय मे जी रहा


दुर्घटना का चश्मदीद होकर भी

खिसक लेता हूं मुँह पलटकर

भ्रातृ में नजर आती है घात

अर्ध्‍दांगी की भंगि में

दिखाई देता है दुश्मन


हर कदम पर

पीछा करती एक परछाई


मैं एक भीरू समय में जी रहा हूँ


अकेले चने की नियति जानकर भी

उच्च रक्तचाप की भाड़ में

उछलता रहता हूँ

कभी तो और दाने भी आएँगे

और तब सब मिलकर

फोड़ेंगे इसे.
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प्रगतिशील कवि जनेश्वर के ‘सतत् आदान के बिना शाश्वत प्रदाता के शिल्प में’ शीर्षक से शीघ्र प्रकाश्य काव्य संग्रह की एक कविता



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